अब मैं भी सबला बन गयी

बचपन में माँ ने कहा,                                                                                                                                   अबला है, तू,                                                                                                                                      आँखें झुका के चल।                                                                                                                             बाप ने कहा मेरा मान है तू,                                                                                                                संभल के चल।

जब कभी हंसीं, जब कभी खिलखिलाई, हर बार कहा, नारी है तू, अबला है तू, चुप रहा कर।

भाई ने मारा, बाप ने लताड़ा, पति ने सताया, समाज ने प्रताडा, कोई बात नहीं, अपने हैं। यही उनका प्यार है, और यही तेरी नियति।

भुला देना चाहती हूँ, दुःख दर्द मैं भी, हंस कर, बोल कर, खिलखिला कर। न जाने क्योँ जमाना कहता है, चुप रहा कर!

बड़ी तो हुई पर, बचपन की हर बात याद कर, माँ का, बाप का, समाज का, हर ज्ञान याद कर, शायद पूर्ण अबला हो गयी।

क्यों नहीं मुझे सबला बनाया, क्यों नहीं बोलना सिखाया, क्यों नहीं मुझे, अपने लिए, सिर्फ अपने लिए, सर उठा, आँखें दिखाना सिखाना।

क्यों नहीं बल दिया, किसी का हाथ रोक अपना उठा सकूँ। चुप न रह, चिला सकूँ।

कुछ थीं जो, माँ के प्यार से, बाप के मान से, सर उठा चल सकीं, और सबला बन सकीं।

आज कुछ सबल उनसे ले, मैं भी सबला बन गयी। फिर भी न जाने क्यों, जमाना कहता है चुप रहा कर, पहले नहीं बोली, अब क्योँ बोली?

आज, जमाना सुन ले, इस मंच से सुन ले। आवाज मैं अपनी पा चुकी,
अब चुप न रह, हंस कर, बोल कर, खिलखिलाकर कर, चिला कर, सर उठा चल, अपना आसमां मैं पा जाऊगी।

क्योंकि अब मैं भी सबला बन गयी,
सबला बन,
आवाज मैं अपनी पा चुकी,
अपना आसमां मैं पा जाऊगी, मैं भी सबला बन गयी।


.......विभा शर्मा (October 2018)

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