कल मित्रों के संग बैठ,
खाते पीते हँसते थे।
आज चार गज की दूरी रख,
सहमे - सहमे चलते हैं।
कल जो धड़ी की सुइयों पे
भाग- भाग थकते थे।
आज उसी घडी की सुइयों को,
बैठ-बैठ के तकते हैं।
कल जो क्लासो में,
पढ़ते-लिखते खेलते थे।
आज वो अपने-अपने घरों में,
वर्चुअल वर्ल्ड में मिलते हैं
कल छींक आने पर,
किस ने याद किया? कहते थे
आज, कुछ हुआ तो नहीं
ठीक हो तुम? कहते हैं
कल इन्सां जो बाहर
और जानवर अंदर बैठा था
आज जानवर बाहर
और इन्सां अंदर बैठा है
कल सरहदों का युद्ध होता था
सेना जीतती-हारती थी
आज प्रयोगो का युद्ध होता है
प्रयोगी जीतता हारता है
कल इन्सां का दुश्मन
एक हार्ड-मॉस का प्राणी था
आज उसी इन्सां का दुश्मन
एक शुक्षम अदिश्र जंतु है।
कल इन्सां जो अपने,
शस्त्र की ताकत में चूर था।
आज वह अपने-अपने शास्त्र में,
उत्तर ढूंढ रहा है।
कल सैनिक युद्ध करता था,
देश हारते जीतते थे।
आज चिकित्सक युद्ध करता है,
जीवन हारता जीतता है।
कल इन्सां जो धरती को रोंद्,
बचाने का धम्भ भरता था।
आज धरती ने ताकत दिखा,
यह भ्रम भी तोड़ दिया।
कल इन्सां ने धरती को,
धुआं- धुआं किया था।
आज वही धरती फिर से नीखर,
स्वछंद नीली सी सुन्दर है।
आओ आज सब मिलके,
दूर से पास से अपने- अपने भाव से।
इस सृस्टि को नमन करे,
इस सृस्टि को प्रणाम करे।
शायद यह सृस्टि, क्षमा कर,
एक और अवसर के प्रदान से।
इन्सां की इस प्रजाति को,
एक बार फिर नमन का अवसर दे।
.....विभा शर्मा (30 मार्च, 2020)