सदा से ही चार दीवारों, एक दरवाज़े और
कुछ खिड़किओं के कमरों में
बच्चों के संग बैठ,
हँसते खिलखिलाते बतियाते,
बातों-बातों में ही पढ़ा लिया करते थे
पढ़ना-लिखना, आपस में मिलना,
कितना ही सहज सा लगता था
हम तो मान ही बैठे थे
ऐसे ही, इसी तरह से
ज्ञान बटोरते-बांटते विलीन हो जाएंगे
पर क्या जानते थे!
ज़िंदगी क्या सिखा जायगी!
एक सूक्षम से जंतु, के कारण
पढ़ने-पढ़ाने के इस तरीके को
बिलकुल ही बदल जायेगी
अब कंप्यूटर के एक डिब्बे के सामने
तारों के जाल में बंधे हुए,
बैठ हाथों से कीबोर्ड की खट-खट करते
बार-बार यह पूछते हैं, बच्चों तुम्हे
क्या, मेरी आवाज सुन रही है? साफ़ सुन रही है?
आज, उस कंप्यूटर के डिब्बे
से झांकती हुई चंद खिड़कियां
कुछ खुली सी और चेहरे दिखातीं हुईं
कुछ बंद सी सिर्फ नाम याँ रोल नंबर
दर्शातीं सी, अजब सी लगती हैं
कुछ आवाजें इधर कीं,
और कुछ आवाजें उधर कीं,
फिर एक गहरा सा सन्नाटा!!
अरे, यह तो कनेक्शन ही टूट गया!
कभी टीचर का, तो कभी बच्चे का!
पढ़ने-पढ़ाने से ज़्यादा, ध्यान है आती-जाती तारों पर
और इंटरनेट के कनेक्शन पर है!
डाटा की जरूरत का
उसकी स्पीड का मायने!
अब समझ आया है
कमरे में बैठ टीचर के सामने
छिपाते हुए, खाने का मज़ा ही कुछ और था
पर अब तो वीडियो ऑफ करो
और कुछ भी खाओ, कुछ भी पियो
ना पता चलेगा, ना खुशबू आएगी! आम के आचार की!
पहले क्लास में सो जाने पर
दोस्त-सहेली कुहनी मारते थे!
उठ मैडम देख रहीं हैं!
पर अब तो वो डर रहा ही नहीं
खुले आम खिड़की बंद कर कुछ सो जाते हैं!
पहले टीचर कक्षा का दरवाज़ा बंद करतीं थीं
कि बाहर से शोर न आये
अब माइक ऑफ करतीं हैं!
डिब्बे की खिड़किओं के!
जो फिर ऑन हो जाता है!
बंद दरवाजों और खुली खिड़कियों के
कमरों में, सिर्फ टीचर और बच्चे
हुआ करते थे और
हँसते खिलखिलाते बतियाते,
बातों-बातों में ही पढ़ लिया करते थे
अब टीचर की खिड़की तो खुली है
पर बच्चों की बंद!
हर आता-जाता शायद टिपण्णी दे जाता है!
यह मैडम हैं! अच्छा! ऐसे पढ़ातीं हैं!
इनकी ड्रेस आज अच्छी नहीं है! कल तो ठीक थी!
टीचर के कपड़ों से लेकर
उसके घर तक को आंक लेते होंगे
कुछ लोग और उनके कुछ लोग!
कभी तो लगता है
ना जाने क्या-क्या जान लेते होंगे लोग!
सिखा तो यह सूक्षम जंतु बहुत कुछ गया,
पढ़ने-पढ़ाने का नया दौर, कई नए गुर सीखा गया!
क्लिक ऑफ़ द बटन से दुनिया विचरण सीखा गया
इंटरनेट की इस पावर का ज्ञान दिला गया, और
बूढ़े तोतों को तो, यह डिब्बा चलाना भी सीखा गया!
यह भी बता गया –
अभी बहुत कुछ जानना बाकी है,
बहुत कुछ सीखना बाकी है,
अभी किताबों का, ज्ञान का बहुत सफर बाकी है,
ठहर कर नहीं, चल-भाग कर जाना है!
यह भी जतला गया –
एक डिब्बे से! दूरियां कैसे नाप्पी जातीं हैं,
नज़दीकियां दूरियों से भी आतीं हैं!
सब अपने-अपने घरों में बैठे ही,
एक साथ इकठे हो ही जाते हैं!
सब से ज्यादा तो यह बता गया
कि ‘वर्क फ्रॉम होम’ आसान नहीं
भाग-दौड़ का एक न ख़तम होने वाला
एक सिलसिला है क्योंकि
क्लास से किचन की दूरी बहुत कम रह गयी है!
चार दीवारों से बने कमरों की
कक्षाओं का वह जाना सा दौर
कक्षा में जा, खिलखिलाते बतियाते,
पढ़ने-पढ़ाने का वह दौर!
न जाने फिर कब आएगा?
- विभा शर्मा (अक्टूबर १४, २०२०)
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Some comments I received on this poem from readers on WhatsApp:
— Dr Vibha Sharma
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