नारा हम बदल चुके हैं,
दुश्मन को मारने का प्रण ले चुके हैं।
रक्त हमारा अमूल्य है, बचाने का प्रण ले चुके हैं,
दुश्मन के रक्त को बहाने का प्रण ले चुके है।
जैसा दुश्मन, वैसी दुश्मनी निभाने का प्रण ले चुके हैं,
युद्ध के मैदान में ही नहीं, चहुँ ओर घात लगाने का प्रण ले चुके हैं।
नारा हम बदल चुके हैं,
दुश्मन को मारने का प्रण ले चुके हैं।
वीरों के खून का, क़र्ज़ हम चुकाने का प्रण ले चुके हैं,
घुटनों पर दुश्मन को लाने का प्रण ले चुके हैं।
माँ-बाप की लाठी, बहन का गुरुर, भाई का संगी,
पत्नी का सिन्दूर, बच्चे का छत्र बचाने का प्रण ले चुके हैं।
नारा हम बदल चुके हैं,
दुश्मन को मारने का प्रण ले चुके हैं।
हर शहीद के क़र्ज़ को चुकाने का प्रण ले चुके हैं,
खून के हर कतरे को, माथे का तिलक बनाने का प्रण ले चुके हैं।
खौलते हुए अपने खून को, खौलते हुए रखने का प्रण ले चुके हैं,
रक्त की हर बूँद का हिसाब लेने का प्रण ले चुके हैं।
आज नारा हम बदल चुके हैं,
दुश्मन को मारने का प्रण ले चुके हैं।
------ विभा शर्मा (मई ९, २०२५)