इन पत्थर मारते लोगों को देख
प्रश्न हैं मेरे मन में
क्या कोई अपने ही घर में
तोड़-फोड़ करता है?
इन पत्थर मारते हुए, आग लगाते हुए,
लोगों को देख
ऐसा प्रतीत होता है,
कि, आज ही दुनिया का अंत है!
जैसे कोई कल, है ही नहीं !
क्या कल यह,
इन्ही गलिओं से नहीं गुजरेंगे?
इसी रेलवे स्टेशन से बाहर गाओं नहीं जाएंगे?
इसी पुलिस वाले से संरक्षण नहीं मांगेंगे?
इसी स्कूल बस से अपने बच्चों को नहीं भजेगें ?
इसी वाहन को नहीं खरीदेंगे ? चलाएँगे ?
क्या कल
पत्थर मार, आग लगा,
मन में विजेता का भाव होगा?
यां गलानि का ?
मन में देश के निर्माता का भाव होगा,
यां देश धवस्ता का?
क्या,
तिनका-तिनका कर जोड़े इस देश को,
हम तिनका-तिनका कर उड़ाना चाहतें हैं?
पत्थर मार, आग लगा बर्बाद करना चाहतें हैं?
देश की आत्मा को घायल करना चाहतें हैं?
देश को हानि पहुँचना चाहतें हैं?
सचमुच
स्तब्ध हूँ , भौच्च्क हूँ, आहत हूँ मैं
देख इस तोड़-फोड़ को,
कुछ उतर चाहतीं हूँ मैं,
अपने इस प्रश्न का
क्या अपने ही घर में
कोई तोड़-फोड़ करता है?
विभा शर्मा (दिसंबर २६, २०१९)