इन छात्राओं को,
कागज़ पर घिसते हुए कलम,
देते हुए उतर कुछ प्रशनो के,
देख मन सोचता है।
क्या?
जीवन की इस धरातल पे,
उसके कंटीले रास्तों पर;
नौकरी की तलाश में,
घिसती हुई चप्पलों,
और भटकते हुए पगो में।
इन प्रश्नों के उतर,
जो शायद रट्टे हुए हैं।
जिनका अर्थ भी शायद मालूम नहीं।
साथ निभा पाएंगे?
अगर निभा भी पाए,
तो कितनी दूर तक?
क्या?
मंजिल तक पंहुचा पाएँगे!
जीवन का नून, तेल और लकड़ी,
दे पाएँगे? बिना किसी बैसाखी के?
मन सोचता ही रह जाता है।
और छात्रायें,
वह प्रशनो के उतर दे,
कुछ खुश, प्रसन्न, कुछ क्षुब्ध,
चिडिओं की तरह बतियाती,
चहचहाती फुदकतीं हुई चली गयीं।
मेरी सोच को बिना जाने बिना छुए!
विभा शर्मा 1992