युद्ध और शांति

सुनते आये हैं,

शांति के लिए युध जरूरी है,
शांति के लिए बलिदान जरूरी है।

कितनों ने ही बलिदान दिया;
कितनों ने ही खून से धरती को सींचा;
कितनों ने ही सीने पर गोली खायी;
कितनो नै ही अपने को मिट्या।

मन व्यथित है,

रोज़ इन बलिदानो को देख कर;
रोज़ इस खून से सिंचिति धरती को देख;
रोज़ किसी का घर उजड़ते देख;
रोज़ किसी की लाठी को गिरते देख;
रोज़ किसी माँ का विलाप देख।

कब तक?
शांति के लिए,
चमन के सिपाही का बलिदान जरूरी है।

कब तक?
शांति के लिए,
युद्ध की आग से गुजरना जरूरी है।

कब तक?
शांति के लिए,
धरती को खून से सींचना जरूरी है।

क्यों नहीं?
हम शांति के लिये,
सियासत छोड़ते।

क्यों नहीं?
हम शांति के लिए,
चमन के सिपाही को नतमस्तक होते।

क्यों नहीं?
हम शांति के लिए,
धरती को पसीने से सींचते।

क्यों नहीं?
हम शांति के लिए,
धरती से सोना उगाते।

क्यों नहीं?
हम शांति के लिए,
सब मिल जुल कर,
धरती को स्वर्ण सा स्वर्ग बनाते।


........विभा शर्मा
June 15, 2018

Let me know your views .......