हर रोज़,
एक नई सुबह के आगाज से,
एक नया चमन बसाने की आस में।
मेरे,
शांत से मन की,
इस खलबली को,
चित की इस बेचैनी को।
क्या नाम दूँ?
खलबली कहूँ या बेचैनी,
रोष कहूँ या बेबसी।
क्या नाम दूँ?
इस चमन के ठेकेदारों कों,
नकाबों पर चेहरों यां चेहरों पर नकाबों को,
चंद लोगो की इस महफिल को।
क्या नाम दूँ?
मेरे शांत से मन की इस,
रोष भरी बेबसी को।
क्यों?
मूक बना चमन का हर दीवाना है,
मजमों में तोला जाता हर पैमाना है,
बेबस बना जमाना है।
क्या नाम दूँ?
शांत से मेरे मन की,
इस खलबली को,
रोष कहूँ याँ बेबसी।
.... विभा शर्मा
March 24, 2018