शुन्य

रंगते हुए,

स्याही से,
स्वेत पन्नों कोI
चित खो सा जाता है,
किसी शून्य मेंI
अकेलेपन की उस खाई में,
जहां,
मेरे सीवा कोई नहीं,
निकलने की कोई रास्ता नहीं,
चढ़ने का कोई सीडी नहींI
भटकती ही रह जाती हूँ,
उस भयानक सी खाई मेंI
लौटती हूँ जब ख्यालों से,
फिर रंगने शुरू करती हूँ,
उन्ही स्वेत पन्नों को!
शायद उनमें ही पनाह,
मिल जायेI

विभा शर्मा
April 1986