स्मृतियों का आलोक

कविता – जो मैंने लोक प्रशासन विभाग, पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ की एलुमनाई मीट – २०२५ के लिए लिखी

आज इस अलुमनाई कार्यक्रम में,
अपने विभाग के बीच खड़ी हूँ —
जहाँ हर कोना, हर मुस्कान
अपनापन बिखेरती है।

याद आता है वो समां...
जब मैं और मेरी सखियाँ — रमा और जसबीर,
क्लासें अटेंड करते,
लाइब्रेरी में देर तक बैठकर पढ़ते थे।
ज्ञान की वह खोज, वह साथ बिताए पल —
आज भी मन के कोनों में जिंदा हैं।

याद है यह गलियारे, वो कॉफी शॉप, वो स्टूडेंट सेंटर,
जहाँ सपनों की बातें होती थीं —
कभी हँसी में, कभी चिंता में,
नई दिशाएँ खोजी जाती थीं।

आज इस अवसर पर,
मन आदर से झुकता है
अपने उन शिक्षकों और मार्गदर्शकों के प्रति —
सत्यदेव सर, कौशिक सर, सुधीर सर, घुमन सर,
सप्रू सर, अनिल मिन्हास सर, आर. के. शर्मा सर,
बी बी गोयल सर, श्यामा भारद्वाज और सविता मैम —
जिन्होंने हमें न केवल पढ़ाया,
बल्कि सोचने और जीने की दिशा दी।

मैं तो अक्सर आती हूँ यहाँ,
पर आज... माहौल कुछ और ही है।
बीते वर्षों की यादें
और नई पीढ़ी का उत्साह —
साथ मिलकर एक जीवंत तस्वीर बनाते हैं।

कितना सुखद है यह देखना —
जिन्हें हमने कभी पढ़ाया था,
वे अब दूसरों को राह दिखा रहे हैं।
इस विभाग की पहचान बन चुके हैं।

और वे, जिन्होंने हमारे साथ
हमारे महाविद्यालय में कार्य किया,
अब अपने नेतृत्व और योगदान से
विभाग का गौरव बढ़ा रहे हैं।

उनकी सफलता और निरंतर योगदान —
ही तो पूंजी है इस शिक्षक की!

विभाग के विद्यार्थी आज विभिन्न क्षेत्रों में,
उत्कृष्ट कार्य कर रहे हैं।
वे जहाँ भी जाते हैं, अपने ज्ञान, संस्कार और संवेदनशीलता से
इस विभाग की पहचान को और सशक्त बनाते हैं।
जब वे दोबारा लौटते हैं,
उनकी उपलब्धियाँ और अनुभव
इस परिसर में नई ऊर्जा और गर्व का संचार कर जाते हैं।

हाँ... यह विभाग मेरे लिए केवल अध्ययन का स्थान नहीं,
बल्कि मेरे जीवन का एक जीवंत अध्याय है —
जहाँ सीखना... आज भी जारी है।

— डॉ. विभा शर्मा
अक्टूबर ३१, २०२५











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