इन छात्राओं को,
कागज़ पर घिसते हुए कलम,
देते हुए उतर कुछ प्रश्नों के,
देख मन सोचता हैI
क्या?
जीवन की इस धरातल पे,
उसके कंटीले रास्तों पर;
नौकरी की तलाश में,
घिसती हुई चप्पलों,
और भटकते हुए पगो मेंI
इन प्रश्नों के उतर,
जो शायद रट्टे हुए हैंI
जिनका अर्थ भी शायद मालूम नहींI
साथ निभा पाएंगे?
अगर निभा भी पाए,
तो कितनी दूर तक?
क्या?
मंज़िल तक पंहुचा पाएँगे!
जीवन का नून, तेल और लकड़ी,
दे पाएँगे? बिना किसी बैसाखी के?
मन सोचता ही रह जाता हैI
और छात्रायें,
वह प्रश्नों के उतर दे,
कुछ खुश, प्रसन्न, कुछ क्षुब्ध,
चिडिओं की तरह बतियाती,
चहचहाती फुदकतीं हुई चली गयींI
मेरी सोच को बिना जाने बिना छुए!
————- विभा शर्मा
June 1993
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