आज के बिल्डर

आज बिल्डरों का यह आलम है,
कि इमारते मंजिले सब चौबारेI
यूं ही थरथरा जाते हैं,
बिना भूकंप की आहट केI

मुश्किल से ऊपर चढ़ाए हुए छज्जे
झट नीचे आ जाते हैंI
मुश्किल से पले-बड़े इंसान,
फट ऊपर चले जाते हैंI

ताश के पत्तों के महल भी,
कभी-कभी हवा के झोंके सह जाते हैंI
पर बिल्डरों के बने यह मकाँ,
झट रेत-मिटटी बन जाते हैंI

विभा शर्मा
November 2017

मेरी सोच (परीक्षा भवन में परीक्षा देती हुई छात्राओं को देख मन में आये कुछ विचार)

इन छात्राओं को,
कागज़ पर घिसते हुए कलम,
देते हुए उतर कुछ प्रश्नों के,
देख मन सोचता हैI
क्या?
जीवन की इस धरातल पे,
उसके कंटीले रास्तों पर;
नौकरी की तलाश में,
घिसती हुई चप्पलों,
और भटकते हुए पगो मेंI
इन प्रश्नों के उतर,
जो शायद रट्टे हुए हैंI
जिनका अर्थ भी शायद मालूम नहींI
साथ निभा पाएंगे?
अगर निभा भी पाए,
तो कितनी दूर तक?
क्या?
मंज़िल तक पंहुचा पाएँगे!
जीवन का नून, तेल और लकड़ी,
दे पाएँगे? बिना किसी बैसाखी के?
मन सोचता ही रह जाता हैI
और छात्रायें,
वह प्रश्नों के उतर दे,
कुछ खुश, प्रसन्न, कुछ क्षुब्ध,
चिडिओं की तरह बतियाती,
चहचहाती फुदकतीं हुई चली गयींI
मेरी सोच को बिना जाने बिना छुए!

                                                 ————-     विभा शर्मा
                                                                      June 1993

कुछ सवाल खुद से पूछीए

सब के सब भारतीय
आज कुछ सवाल, खुद से पूछीए
क्या लोकतंत्र में, सब जायज़ है?

क्या कोई मायने नहीं है,
लोकतंत्र के इन चिन्हों का,
अपने ही संविधान के पन्नों का?

अपनी बनायीं संस्थओं का?
अपनी चुनी सरकारों का?
अपने ही चमन का?

क्या किसी का कोई उत्तरदाईत्व नहीं ?
क्या हम इतने स्वछंद है?
क्या कोई भी मर्यादा नहीं?

बहुत मुश्किल से मिली आज़ादी है,
क्या चमन को तोड़,
तिनका -तिनका कर उड़ाने के लिए?

कहीं तो लकीर खींचनी होगी
कहीं तो रोक लगनी होगी
कहीं तो बैठ सोचना होगा

आज चमन आहत हुआ है,
आज चमन शर्मसार हुआ है,
आज चमन की आत्मा रोई है

हम कर क्या रहे हैं?
किस दिशा में जा रहे हैं
क्यूँ जा रहे हैं?

कहीं न कहीं हमे रुकना होगा,
आज ही बैठ सोचना होगा,
अब ही संभल जाना होगा

कल देर न हो जाए,
आज कुछ सवाल, खुद से पूछीए
क्या लोकतंत्र के नाम पर, सब जायज़ है?

—- विभा शर्मा (जनवरी २६, २०२१)