दूर गगन में उड़ते हुए पंछी को देख,
सोचा!
कितना उन्मुक्त जीवन जीतें हैं वो!
और हम?
जकड़े ही रहते हैं बेड़ियों में,
कुछ सांसारिक, तो कुछ पारिवारिक;
कुछ ऐच्छिक, तो कुछ अनैच्छिक;
कुछ समाज की, तो कुछ महजब कीI
क्यों नहीं हम दायरे से बहार झांकते?
क्यों नहीं हम बेड़ियों-बंधनों को तोड़ते?
क्यों नहीं हम पंछी की तरह उन्मुक्त हो?
दूर गगन में उड़ान भरते?
क्यों उन्हें उन्मुक्त देख सिर्फ सहराते?
क्यों अपने को असहाय मानते?
आओ, आज भी देर नहीं हुई हैI
हम इन बेड़ियों-बंधनों को तोड़े,
आओ आज हम भी उड़े,
दूर गगन की उच्चाईओं मेंI
विभा शर्मा
June 8, 2018