पंडित राम सरन दास जी लाहौर में रहने वाले एक प्रसिद्ध वकील थे। स्वतंत्रता संघर्ष के दौरन वह क्रांतिकारियों के वकील थे और देशभक्ति की कविताएँ भी लिखते थे| स्वतंत्रता से पहले ही उनका निधन हो गया था | पंडित राम सरन जी मेरे नाना जी थे|अब मैं आपको उनका का संक्षिप्त परिचय देती हूँ |
पंडित राम सरन – एक जाने-माने वकील
पंडित जी ने लाहौर से वकालत की डिग्री हासिल की और वहीँ हाई कोर्ट में वकालत करते थे। लाहौर के अनारकली बाजार में उनकी हवेली थी। हमने सुना है कि उन्होंने वहां कुछ वकीलों और अन्य लोगों के साथ मिल कर ‘गैंती फ़ौज’ का गठन किया था, जो स्वतंत्रता संग्राम में छिपे तौर पर भाग लेती थी |
पंडित राम सरन दास जी “लाहौर कांस्पीरेसी केस” में भी वकील थे इसका उल्लेख प्रसिद्ध पंजाबी उपन्यासकार नानक सिंह ने अपने उपन्यास ‘इक मियां दो तलवारें’ में 212 पृष्ठ पर किया है। इसमें लिखा है कि “… क़ानूनी सदस्य सर अली इमाम से मिलकर अभियुक्तों के प्रमुख वकील पंडित राम सरन दास ने क़ानूनी पक्ष से उसे सहमत कर लिया कि सचमुच मृत्यु-दंड देने वाले जजों ने पक्षपात और कट्टरता से काम लिया | इस भागदौड़ का इतना परिणाम अवश्य हुआ कि अंत में वाइसराय ने इस केस पर दोबारा द्रिष्टिपात करना स्वीकार कर लिया, कि जब तक यह कार्य पूरा न हो, दोषिओं को फाँसी न दी जाए “|
उनकी बड़ी बेटी दिवंगत सावित्री देवी की पुत्री, वीना शर्मा ने बताया कि पंडित राम सरन जी शहीद भगत सिंह केस में भी एक वकील थे| उनकी माता जी पंडित जी के पास लाहौर घर पर आतीं थीं| शहीद भगत सिंह जी की शहादत से कुछ दिन पहले पंडित जी उनकी मां (सावित्री देवी) को शहीद भगत सिंह जी से मिलवाने जेल ले कर गए थे। उस समय वह (सावित्री देवी) बहुत छोटी थी और उन्हें पंडित जी ने सफेद परिधान पहनाए हुए थे। पंडित जी ने सावित्री जी को शहीद भगत सिंह जी को प्रणाम कर उनसे आशीर्वाद लेने को कहा| उन्होंने आगे कहा की जब शहीद भगत सिंह जी को फाँसी दी गयी थी उस समय उनके माता-पिता पंडित जी के घर में ही थे।
पंडित राम सरन – प्रसिद्द कवी व लेखक
पंडित राम सरन एडवोकेट/पंडित राम सरन दास लाहौर के कानूनी और साहित्यिक हलकों में एक प्रमुख व्यक्ति थे। मौला बख्श खुस्ता की पुस्तक ‘पंजाबी शायरों का तज़करा’ के अनुसार पंडित राम सरन जी ने 1918 तक उर्दू और हिंदी में कवितायें लिखना शुरू कर दिया था। वारिश शाह द्वारा ‘हीर’ उन्होंने तीन बार पढ़ने के बाद याद कर लिया था। बाद में उन्होंने अपनी मातृभाषा पंजाबी में लिखना शुरू किया।
अमृतसर में यह महसूस करने के बाद कि पंजाबी भाषा का ह्रास हो रहा है, पंडित राम सरन जी ने पंजाबी भाषा को बढ़ावा देने के लिए लाहौर में ‘पंजाबी लिटरेरी लीग’ की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वह ‘पंजाबी सभा’ पंजाब के उपाध्यक्ष भी थे।
पंडित राम सरन जी ने रेडियो द्वारा आयोजित ‘कवि दरबारों’ में भी भाग लिया लिया करते थे। मैंने इसे 7 जून 1944 में प्रकाशित ‘द इंडियन लिसनर’ के 16-30 जून, 1944 के कार्यक्रमों का विवरण में देखा। वह 24 जून, 1944 को लाहौर रेडियो द्वारा आयोजित ‘कवि दरबार’ में भाग लेने वाले प्रमुख कवियों में से एक थे।
- श्रीमद भगवत गीता (1935) – पंडित राम सरन जी ने श्रीमद भगवत गीता का अनुवाद गुरमुखी (काव्य) में किया। यह अनुवाद देवनागरी और गुरुमुखी दोनों लिपिओं में है|भगवद गीता के सभी अध्यायों का यह गुरुमुखी अनुवाद देवनागरी लिपि में है| श्रीमद भगवत गीता का गुरमुखी अनुवाद भी है जो मुझे पंजाब डिजिटल लाइब्रेरी, चंडीगढ़ से मिला|
- ‘पंजाब दे गीत’ (1931) – पंजाबी साहित्य में भी उनका बहुमूल्य योगदान है। पंडित जी ने पंजाबी लोक गीतों का संग्रह ‘पंजाब दे गीत’ (1931) में लाहौर में शाहमुखी और गुरमुखि में छपवाया| पंजाबी साहित्य की मुखय पुस्तकों में इसका उल्लेख है। कुछ उदहारण –
- डॉ. करनैल सिंह थिंद की किताब ‘पंजाब दा लोक विरसा’ पार्ट-१ के पृष्ठ 94 पर किया गया है।
- मौला बख्श कुश्ता (1932) की ‘पंजाब दे हीरे’ के 24 पन्ने पर है।
- अलोचना मैगज़ीन पहले इशू – जून 1955 के 96 पन्ने पर है।
- सुखदेव माधपुरी की किताब ‘पंजाबी साहित्य दे आर्सी’ के 68 पन्ने पर है।
- पंजाबी पीडिया – साहित्यिक गीत के वेबपेज में विवेचना है
- मौला बख्श कुश्ता की किताब ‘पंजाबी शायरों का तज़करा’ के ४५६ पन्ने पर है। (Urdu)
3. वैदिक संध्या – पंडित राम सरन जी ने ‘वैदिक संध्या’ का भी सरल हिंदी (काव्य) में अनुवाद किया था।
4. शरा बैंत शाह मुहमद – मौला बख्श कुश्ता की किताब ‘पंजाबी शायरों का तज़करा’ में ज़िक्र है कि पंडित जी ने शाह मुहमद की बैंतां का विवरण छपवाया।
5. सप्त पदी – पंडित राम सरन जी ने ‘सप्त पदी’ का भी सरल हिंदी (काव्य) में अनुवाद किया था।
6. कविताएँ – पंडित जी की कई कवितायें ‘प्रीत लड़ी’ और ‘फुलवारी’ पत्रिकाओं में छपीं थी।
कुछ जो मुझे मिली – ‘क़ुरबानी दा आख़री दिन’ ‘हक़ नू खलकत भुल गयी ऐ’।
परिवार
पंडित जी के पूर्वज कश्मीरी पंडित थे और कश्मीर में लकड़ी-लठों का व्यापार करते थे। मुग़लों के शासन में उनका परिवार कश्मीर से गुरुओं की संगत के साथ बाबा बकाला आ गया था। वहां से परिवार के लोग लाहौर और अमृतसर में बस गए। पंडित जी के छोटे भाई स्वर्गीय श्री बिशन दास शर्मा जी जालंधर में रहते थे और वहां के जाने-माने एडुकेशनिस्ट थे |
पंडित राम सरन जी, पुत्र श्री मोहन लाल जी, का जन्म १ मार्च १८९५ में हुआ था। उनकी मृत्यु सितम्बर १२, १९४६ में लाहौर में हार्ट अटैक से हुई थी। पंडित जी के दो बेटे (वेद प्रकाश और ओम प्रकाश) और चार बेटियां (सावित्री देवी, कृष्णा, स्वराज और शारदा) थीं, जो अब इस नश्वर संसार में नहीं हैं। उनके बेटे वेद प्रकाश ने भारतीय सेना के अर्टिलरी में और ओम प्रकाश दिल्ली में निजी क्षेत्र में कार्यरत थे। बेटियों में सावित्री देवी अमृतसर और कृष्णा, स्वराज और शारदा चंडीगढ़ में रहती थीं।
पंडित राम सरन दास जी के परिवार में अब उनके पोते, परपोते, नवासे, और नवासियाँ हैं। हम दोनों – नीरा शर्मा (दिवंगत कृष्णा की बेटी) और विभा शर्मा (दिवंगत स्वराज की बेटी) उनकी नवासियाँ हैं। हमने सोचा कि उनका यह अनुवाद फिर प्रकाशित किया जाए ताकि लोगों को उनकी इस उत्कृष्ट और लोकप्रिय कृति को पढ़ने का मौका मिले। पंडित जी के गीता के इस दुर्लभ अनुवाद की एक प्रति उनकी पुत्री श्रीमती कृष्णा के पास उपलब्ध थी जो अब उनकी पुत्री श्रीमती नीरा शर्मा के पास है।
पंडित राम सरन दास जी के जीवन से जुड़ी कुछ घटनाएं
हमने अपनी माताजी से पंडित राम सरन दास जी के जीवन से जुड़ी कुछ घटनाएं सुनी हैं जिसका मैं वर्णन कर रही हूँ |
श्रीमती वीना जी ने बताया की पंडित जी ने लाला लाजपत राय जी के साथ, साइमन कमीशन के विरुद, प्रदर्शन में भाग लिया था। जिसके लिए उन्हें दो अन्य विद्यार्थिओं के साथ, एक सत्र के लिए कॉलेज से निलंबित किया गया था। वह लाहौर के जत्थे में शामिल हो जल्लिआं वाला बाग़ के प्रदर्शन में भी शामिल थे। हत्याकाण्ड से कुछ ही समय पहले वह लोग लंगर के लिए निकले थे, और वहीँ उन्हें हत्याकाण्ड का पता चला।
श्रीमती वीना जी को उनकी माता सावित्री देवी जी ने यह भी बताया कि पंडित राम सरन जी के पास एक दिन सुबह-सुबह एक व्यक्ति ‘खान चाचा’ उनके घर आये और कहा ‘काम हो गया’। पहले तो सब के पूछने पर पंडित जी ने कुछ नहीं बताया, बाद में पता चला कि ‘खान चाचा’ ‘नेताजी सुभाष चंद्र बोस’ के काबुल पहुंचने का समाचार दे रहे थे।
श्रीमती वीना जी ने बताया की उनकी माता जी ने ‘गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर जी’ को श्रीमद भगवत गीता के अनुवाद का कुछ भाग गा कर सुनाया था जब गुरुदेव लाहौर आये थे और लाला धनि राम भल्ला जी की कोठी में ठहरे थे। गुरदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर जी को यह अनुवाद बहुत पसंद आया था।
उनकी दूसरी पुत्री श्रीमती कृष्णा जी की पुत्री श्रीमती नीरा शर्मा का कहना है कि जब उनकी माता (श्रीमती कृष्णा) छोटी थीं तो उनकी मुलाकात शहीद भगत सिंह जी की माता जी से लाहौर स्थित उनके घर में हुई थी। पंडित जी ने उनका परिचय कराया था और उन्होंने भगत सिंह की माता जी को शास्टांग प्रणाम किया था।
मेरी (विभा शर्मा) की माता जी स्वर्गीय स्वराज शर्मा ने मुझे बताया था कि मेरे नाना जी (दिवंगत राम सरन दास) ने उनका (मेरी मां) नाम आंदोलन से जुड़ी ‘स्वराज पार्टी’ के नाम पर रखा था। उन्होंने यह भी कहा कि वे क्रांतिकारी कविताएँ लिखते थे और यह कविताएँ पंडित जी अपने वास्तविक नाम से नहीं बल्कि अपनाए हुए दूसरे नाम से लिखी थीं।
कुछ अन्य संस्मरण
अभी हाल ही में मेरा संपर्क श्री सुभाष शर्मा जी से हुआ जो पंडित बरकत राम ‘युमन’ जी के पौत्र है और नई दिल्ली के निवासी हैं। उन्होंने कुछ यादें सांझी की जो निम्नलिखित हैं:
पंजाबी कवी, उस्ताद शायर श्री बरकत राम ‘युमन’ जी के पौत्र श्री सुभाष शर्मा जी ने बताया कि पंडित राम सरन जी, उनके दादा जी, पंडित बरकत राम ‘युमन’ जी, के काव्य गुरु थे। दोनों में बहुत स्नेह था। दोनों और साथ में दूसरे कवि साथी आजादी के लिए अंग्रेजों के खिलाफ कविताएं पढ़ते थे।
श्री सुभाष शर्मा जी ने यह भी बताया कि जिस दिन पंडित जी की मृत्यु हुई थी उस दिन पंडित बरकत राम ‘युमन’ जी उनके साथ थे। उस दिन बहुत तेज बारिश हो रही थी और उनका अंतिम संस्कार करने में बहुत कठिनाई हुई थी।
श्री सुभाष शर्मा ने अपनी बुआ जी, श्रीमती प्रकाश वती जी (श्री बरकत राम ‘युमान’ की पुत्री) से पंडित राम सरन जी के बारे में बात की। श्रीमती प्रकाश वती बटाला शहर में रहने वाली एक नब्बे वर्षीय महिला हैं। वह १९४७ में १६ साल की थीं। श्रीमती प्रकाश वती जी ने श्री सुभाष जी को बताया कि उन्होंने पंडित राम सरन एडवोकेट जी को लाहौर के ग्वालमंडी मुहल्ले की ऐतिहासिक इमारत ‘अमृतधारा’ के हॉल में आयोजित कवि दरबारों में कई बार देखा था। श्रीमती प्रकाश वती जी ने आगे बताया की वह एक बहुत विद्वान और देशभक्त वक्ति थे। गोरे रंग के थे और चश्मा पहनते थे। वह सिल्क का कुर्ता और हिन्दू विद्वानों की तरह धोती पहनते थे।
स्वर्गीय पंडित राम सरन एडवोकेट जी की नवासी
डॉ। विभा शर्मा
सहायक प्रोफेसर
एम. सी. एम. डी.ए.वी. कॉलेज
सेक्टर 36, चंडीगढ़ |
vibhasharma9@gmail.com