कहानी नारी की अब ……
हाँ, मैं भी सबला हूँ अब,
रचयिता हूँ अपने पथ की अब।
छोड़ा है काँटों से डरना अब,
फूलों से सीखा है सजना अब।
मेरी रीति नहीं रुकना अब,
मैं सपनों की संवाहिका हूँ अब।
कठिन राहें भी झुकती हैं अब,
वही आकाश हैं मेरा अब।
डर की कोई दीवार नहीं अब,
आँधियों से समझौता नहीं अब।
मेरे सपने साकार हैं, अब,
हाँ, मैं भी सबला हूँ, अब।
राह बनाई है साहस से अब,
पहचान भी पाई है अब।
उड़ान हैं कदम मेरे अब,
हाँ, मैं भी सबला हूँ अब।
टूटे हैं बंधन सारे अब,
विशाल है गगन मेरा अब।
नयी उम्मीदों की हूँ, ज्योति अब,
अपने विश्वास की हूँ, शक्ति अब।
हाँ, मैं भी सबला हूँ अब।
...... विभा शर्मा
८ मार्च, २०२६
कहानी नारी की तब ………