आज के बिल्डर

आज बिल्डरों का यह आलम है,
कि इमारते मंजिले सब चौबारेI
यूं ही थरथरा जाते हैं,
बिना भूकंप की आहट केI

मुश्किल से ऊपर चढ़ाए हुए छज्जे
झट नीचे आ जाते हैंI
मुश्किल से पले-बड़े इंसान,
फट ऊपर चले जाते हैंI

ताश के पत्तों के महल भी,
कभी-कभी हवा के झोंके सह जाते हैंI
पर बिल्डरों के बने यह मकाँ,
झट रेत-मिटटी बन जाते हैंI

विभा शर्मा
November 2017


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