Bhagwad Gita (Karamyog) Punjabi Translation by Pandit Ram Saran Advocate

Read more: Bhagwad Gita (Karamyog) Punjabi Translation by Pandit Ram Saran Advocate

विजय दशमी के दिन

आज विजय दशमी के पावन दिन,
अधर्म पर धरम की विजय के दिन।  
आओ आज हम भी अपने जीवन से, 
अधर्म को निकाल, धर्म का रुख करें। 

त्यागें अधर्म, क्रोध, हिंसा, लालच और लोभ, 
अपनाये धर्म, शांति, अहिंसा, संतोष और त्याग। 
अविवेक, अहंकार और दम्भ भी त्याग,
अपनाये विवेक, निरहंकार और नम्रता। 

अपनी 'मैं' को अपने पास रख,
सब में 'मैं' को देख। 
सत्य, क्षमा और शील अपना कर,
आज अधर्म से धर्म में आकर।

आज चलो सिर्फ रावण को ही न जला कर,
अपने अहंकार को, क्रोध को, 
अविवेक को और दम्भ को जला कर,
विवेक, शील, नम्रता से अपने को परिपूर्ण करें। 

आओ आज विजय दशमी के पावन दिन, 
अधर्म को अपने जीवन से निकाल, 
धर्म का रुख कर, चेतना जाग्रित कर,
चलें, राम के मार्ग पर।  


विभा शर्मा 
अक्टूबर ५, २०२२

चुनावों का मौसम

एक तरफ –
           आज फिर चुनावों का मौसम है,
           आज फिर चुनावों का मेला है,
           आज फिर कुछ अंकों का खेला है,
           आज फिर जोड़-तोड़ का झमेला है।

दूसरी तरफ –
           दरियाँ और धरने है,
           सड़कों पर शिक्षकों का रेला है,
           हर तरफ हर तरह के नारें हैं,
           हाय-हाय की आवाज़ के साथ।

और तीसरी तरफ?
            जोड़-तोड़ का झमेले में फंसा,
            राजनेता प्रशासन भूल,
            रैली पर रैली कर रहा है,
            राजनैतिक नेतागिरी कर रहा है।
 
             शिक्षकों को उनका अधिकार न दे,
             उनको उनका हक़ न दे,
             बहुत कुछ मुफ्त में बाँट रहा है,
             और शायद वोट खरीद रहा है।

हर तरफ –

             आज फिर चुनावों का मौसम है,
             आज फिर चुनावों का मेला है,
             आज फिर कुछ अंकों का खेला है,
             आज फिर जोड़-तोड़ का झमेला है।

                  ….. विभा शर्मा, जनवरी ४, २०२२ 

उच्च शिक्षा

पंजाब की सरकार से गुहार है,

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से अलग हो, 
उच्च शिक्षा को बदहवास कर, 
उच्च शिक्षा का नास न करो। 
और विद्यार्थी के कल का ह्रास न करो।  

सातवें वेतन आयोग को,
सारे राज्य कर चुके लागू। 
दे मान शिक्षा को,
दिया मान शिक्षक को। 

अभी भी समय है, 
सातवें आयोग को लागू कर,
तुम भी रख लो मान शिक्षा का,
तुम भी दे दो मान शिक्षक को। 

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से अलग हो, 
उच्च शिक्षा को बदहवास कर, 
उच्च शिक्षा का नास न करो। 
और विद्यार्थी के कल का ह्रास न करो।  

विभा शर्मा, २९ दिसंबर २०२१ 

तक्क्षिला और नालन्दा की धरती इस धरती पर

तक्क्षिला और नालन्दा की इस धरती पर,
जहाँ शिक्षा का दर्जा ऊँचा था,
जहाँ शिक्षक का मान ऊँचा था।

राजनैतिक तंत्र वहाँ क्या कर गया?
शिक्षा को रोल गया,
शिक्षक को रोंध गया।

संस्कारों को छोड़ गया,
शिक्षाओं को भूल गया,
इतिहास को रोंध गया।

तक्क्षिला और नालन्दा की इस धरती पर,
फिर से उस स्वर्णिम युग को लाना है,
शिक्षा से, राजनीति को हटाना है।

फिर शिक्षा का मान बढ़ाना है,
फिर शिक्षक का मान बढ़ाना है,
तक्क्षिला और नालन्दा की इस धरती पर।

      ---- विभा शर्मा दिसंबर ७, २०२१

गगन का पंछी

दूर गगन में उड़ते हुए पंछी को देख,
सोचा!
कितना उन्मुक्त जीवन जीतें हैं वो!

और हम?
जकड़े ही रहते हैं बेड़ियों में,
कुछ सांसारिक, तो कुछ पारिवारिक;
कुछ ऐच्छिक, तो कुछ अनैच्छिक;
कुछ समाज की, तो कुछ महजब कीI

क्यों नहीं हम दायरे से बहार झांकते?
क्यों नहीं हम बेड़ियों-बंधनों को तोड़ते?
क्यों नहीं हम पंछी की तरह उन्मुक्त हो?
दूर गगन में उड़ान भरते?
क्यों उन्हें उन्मुक्त देख सिर्फ सहराते?
क्यों अपने को असहाय मानते?

आओ, आज भी देर नहीं हुई हैI
हम इन बेड़ियों-बंधनों को तोड़े,
आओ आज हम भी उड़े,
दूर गगन की उच्चाईओं मेंI

विभा शर्मा
June 8, 2018

आज के बिल्डर

आज बिल्डरों का यह आलम है,
कि इमारते मंजिले सब चौबारेI
यूं ही थरथरा जाते हैं,
बिना भूकंप की आहट केI

मुश्किल से ऊपर चढ़ाए हुए छज्जे
झट नीचे आ जाते हैंI
मुश्किल से पले-बड़े इंसान,
फट ऊपर चले जाते हैंI

ताश के पत्तों के महल भी,
कभी-कभी हवा के झोंके सह जाते हैंI
पर बिल्डरों के बने यह मकाँ,
झट रेत-मिटटी बन जाते हैंI

विभा शर्मा
November 2017

मेरी सोच (परीक्षा भवन में परीक्षा देती हुई छात्राओं को देख मन में आये कुछ विचार)

इन छात्राओं को,
कागज़ पर घिसते हुए कलम,
देते हुए उतर कुछ प्रश्नों के,
देख मन सोचता हैI
क्या?
जीवन की इस धरातल पे,
उसके कंटीले रास्तों पर;
नौकरी की तलाश में,
घिसती हुई चप्पलों,
और भटकते हुए पगो मेंI
इन प्रश्नों के उतर,
जो शायद रट्टे हुए हैंI
जिनका अर्थ भी शायद मालूम नहींI
साथ निभा पाएंगे?
अगर निभा भी पाए,
तो कितनी दूर तक?
क्या?
मंज़िल तक पंहुचा पाएँगे!
जीवन का नून, तेल और लकड़ी,
दे पाएँगे? बिना किसी बैसाखी के?
मन सोचता ही रह जाता हैI
और छात्रायें,
वह प्रश्नों के उतर दे,
कुछ खुश, प्रसन्न, कुछ क्षुब्ध,
चिडिओं की तरह बतियाती,
चहचहाती फुदकतीं हुई चली गयींI
मेरी सोच को बिना जाने बिना छुए!

                                                 ————-     विभा शर्मा
                                                                      June 1993

कुछ सवाल खुद से पूछीए

सब के सब भारतीय
आज कुछ सवाल, खुद से पूछीए
क्या लोकतंत्र में, सब जायज़ है?

क्या कोई मायने नहीं है,
लोकतंत्र के इन चिन्हों का,
अपने ही संविधान के पन्नों का?

अपनी बनायीं संस्थओं का?
अपनी चुनी सरकारों का?
अपने ही चमन का?

क्या किसी का कोई उत्तरदाईत्व नहीं ?
क्या हम इतने स्वछंद है?
क्या कोई भी मर्यादा नहीं?

बहुत मुश्किल से मिली आज़ादी है,
क्या चमन को तोड़,
तिनका -तिनका कर उड़ाने के लिए?

कहीं तो लकीर खींचनी होगी
कहीं तो रोक लगनी होगी
कहीं तो बैठ सोचना होगा

आज चमन आहत हुआ है,
आज चमन शर्मसार हुआ है,
आज चमन की आत्मा रोई है

हम कर क्या रहे हैं?
किस दिशा में जा रहे हैं
क्यूँ जा रहे हैं?

कहीं न कहीं हमे रुकना होगा,
आज ही बैठ सोचना होगा,
अब ही संभल जाना होगा

कल देर न हो जाए,
आज कुछ सवाल, खुद से पूछीए
क्या लोकतंत्र के नाम पर, सब जायज़ है?

—- विभा शर्मा (जनवरी २६, २०२१)