Poem – ਕੁਰਬਾਨੀ ਦਾ ਆਖ਼ਰੀ ਦਿਨ

Poem on Shahid Bhagat Singh Ji by Pandit Ram Saran Das Advocate (1895-1946)

Poem by Pandit Ram Saran Das Advocate published in Phulwari in April 1938 on Shahid Bhagat Singh Ji – retrieved from Phulwari (April 1938).

The audio file is the recitation of the poem by Mr. G. S. Bhatti – Punjabi Teacher from Amritsar

Bhagwad Gita (Karamyog) Punjabi Translation by Pandit Ram Saran Advocate

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विजय दशमी के दिन

आज विजय दशमी के पावन दिन,
अधर्म पर धरम की विजय के दिन।  
आओ आज हम भी अपने जीवन से, 
अधर्म को निकाल, धर्म का रुख करें। 

त्यागें अधर्म, क्रोध, हिंसा, लालच और लोभ, 
अपनाये धर्म, शांति, अहिंसा, संतोष और त्याग। 
अविवेक, अहंकार और दम्भ भी त्याग,
अपनाये विवेक, निरहंकार और नम्रता। 

अपनी 'मैं' को अपने पास रख,
सब में 'मैं' को देख। 
सत्य, क्षमा और शील अपना कर,
आज अधर्म से धर्म में आकर।

आज चलो सिर्फ रावण को ही न जला कर,
अपने अहंकार को, क्रोध को, 
अविवेक को और दम्भ को जला कर,
विवेक, शील, नम्रता से अपने को परिपूर्ण करें। 

आओ आज विजय दशमी के पावन दिन, 
अधर्म को अपने जीवन से निकाल, 
धर्म का रुख कर, चेतना जाग्रित कर,
चलें, राम के मार्ग पर।  


विभा शर्मा 
अक्टूबर ५, २०२२

चुनावों का मौसम

एक तरफ –
           आज फिर चुनावों का मौसम है,
           आज फिर चुनावों का मेला है,
           आज फिर कुछ अंकों का खेला है,
           आज फिर जोड़-तोड़ का झमेला है।

दूसरी तरफ –
           दरियाँ और धरने है,
           सड़कों पर शिक्षकों का रेला है,
           हर तरफ हर तरह के नारें हैं,
           हाय-हाय की आवाज़ के साथ।

और तीसरी तरफ?
            जोड़-तोड़ का झमेले में फंसा,
            राजनेता प्रशासन भूल,
            रैली पर रैली कर रहा है,
            राजनैतिक नेतागिरी कर रहा है।
 
             शिक्षकों को उनका अधिकार न दे,
             उनको उनका हक़ न दे,
             बहुत कुछ मुफ्त में बाँट रहा है,
             और शायद वोट खरीद रहा है।

हर तरफ –

             आज फिर चुनावों का मौसम है,
             आज फिर चुनावों का मेला है,
             आज फिर कुछ अंकों का खेला है,
             आज फिर जोड़-तोड़ का झमेला है।

                  ….. विभा शर्मा, जनवरी ४, २०२२ 

उच्च शिक्षा

पंजाब की सरकार से गुहार है,

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से अलग हो, 
उच्च शिक्षा को बदहवास कर, 
उच्च शिक्षा का नास न करो। 
और विद्यार्थी के कल का ह्रास न करो।  

सातवें वेतन आयोग को,
सारे राज्य कर चुके लागू। 
दे मान शिक्षा को,
दिया मान शिक्षक को। 

अभी भी समय है, 
सातवें आयोग को लागू कर,
तुम भी रख लो मान शिक्षा का,
तुम भी दे दो मान शिक्षक को। 

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से अलग हो, 
उच्च शिक्षा को बदहवास कर, 
उच्च शिक्षा का नास न करो। 
और विद्यार्थी के कल का ह्रास न करो।  

विभा शर्मा, २९ दिसंबर २०२१ 

तक्क्षिला और नालन्दा की धरती इस धरती पर

तक्क्षिला और नालन्दा की इस धरती पर,
जहाँ शिक्षा का दर्जा ऊँचा था,
जहाँ शिक्षक का मान ऊँचा था।

राजनैतिक तंत्र वहाँ क्या कर गया?
शिक्षा को रोल गया,
शिक्षक को रोंध गया।

संस्कारों को छोड़ गया,
शिक्षाओं को भूल गया,
इतिहास को रोंध गया।

तक्क्षिला और नालन्दा की इस धरती पर,
फिर से उस स्वर्णिम युग को लाना है,
शिक्षा से, राजनीति को हटाना है।

फिर शिक्षा का मान बढ़ाना है,
फिर शिक्षक का मान बढ़ाना है,
तक्क्षिला और नालन्दा की इस धरती पर।

      ---- विभा शर्मा दिसंबर ७, २०२१

गगन का पंछी

दूर गगन में उड़ते हुए पंछी को देख,
सोचा!
कितना उन्मुक्त जीवन जीतें हैं वो!

और हम?
जकड़े ही रहते हैं बेड़ियों में,
कुछ सांसारिक, तो कुछ पारिवारिक;
कुछ ऐच्छिक, तो कुछ अनैच्छिक;
कुछ समाज की, तो कुछ महजब कीI

क्यों नहीं हम दायरे से बहार झांकते?
क्यों नहीं हम बेड़ियों-बंधनों को तोड़ते?
क्यों नहीं हम पंछी की तरह उन्मुक्त हो?
दूर गगन में उड़ान भरते?
क्यों उन्हें उन्मुक्त देख सिर्फ सहराते?
क्यों अपने को असहाय मानते?

आओ, आज भी देर नहीं हुई हैI
हम इन बेड़ियों-बंधनों को तोड़े,
आओ आज हम भी उड़े,
दूर गगन की उच्चाईओं मेंI

विभा शर्मा
June 8, 2018